Posted by: rajprajapati | 31/05/2011

संसारमें ”सत्य” ही धर्म है.

संसारमें सत्य ही धर्म है.

आप भारतके इतिहास पे एक नजर डालो,  जब सत्ययुग होगा तब भी भगवानश्री राम और भगवानश्री किष्णा को भी पुरा जीवन सत्य के लीये संघर्षमें ही गुजारना पडा है. जब भी बडी मात्रा में असत्य के सामने सत्य की लडाइ शुरू होती है. तब सत्य के लीये लडनेवाले के सामाजीक और निजी जीवनमें संघर्ष चलता है. वास्तवमें सत्य के संघर्ष का ही दुसरा नाम जीवन है. मैने भारत के लोगो को सत्याग्रह के जन आंदोलनमें सामील होने का आह्वान इसलीये तो कीया है. की सही मायनेमें सही,  अर्थमें हमे जीना है….

हम मानव का शरीर लेकर पैदा हुऐ है तो हमे मनुष्य का ही कर्तव्य अदा करना है. जीतना भी भाग्यमें जीवन है वो एक मनुष्य के रूपमें हमे निभाना है. आप अपने आप के निजी जीवनमें थोडी गहेराइ से द्द्ष्टि कीजीये तो पता चलेगा की हम पशु के समान जीवन जी रहे है, हमे अपना कोइ स्वाभिमान नहीं रहा है.. समय के साथ साथ हम पशु से मनुष्य तक की उत्क्रांती करते आये है ऐसे ही अब हम मनुष्य से पशु की और द्रृत क्रांती करते आये है…..

आज भारतमें समाज व्यवस्था चलाने के लीये और सब के समान अधिकारोकी भारतीय लोकशाहीमें महाव्याधी के रूपमें फैले हुए भ्रष्टाचार को नाबुद करने के लीये एक नयी चेतना के साथ सत्याग्रह प्रारंभ हुआ है. ये कोइ संगठ्ठन का या कोइ खास संप्रदाय का सत्याग्रह नहीं है, ये सत्याग्रह कोइ व्यक्ति विचारधारा से नहीं आया है, यह सत्याग्रह कोइ एक धर्म के लीये नहीं, ये सत्याग्रह सत्य के अनुसाशन के लीये है, ये सत्याग्रह हर मनुष्य के अधिकारो के लीये है. ये कोइ व्यवस्था के लीये कीसी के भी विरोध के रूपमें नहीं. समय के साथ चलती हुइ व्यवस्थाओ में हम सब सामील रहे है आज जो सत्याग्रह चल रहा है. वो समय के परीवर्तन का एक विशेषरूप है.

आप इतना तो सोचीये की हम बहुत सारी सुविधायें और सुख जुटाकर,  अपने बच्चो के लीये अच्छा जीवन बनाने के लीये बहुत कुछ करते रहते है, मकान बनवाते है, अच्छी से अच्छी शिक्षा का प्रबंध करते है,  हो शके उतनी सुरक्षा के साथ हम हमारे परीवार को सुख प्रदान करने में जींदगीभर संघर्ष करते है, ये सब तो अपने परीवार की व्यवस्था है,  अपना नीजी स्वार्थ है,  हमने अपने नीजी स्वार्थ के लीये इतना बहुत कुछ कीया है हम हमारा सामाजीक उतरदायीत्व भुल गये है,  इसलीये आज हमारी समाज व्यवस्थामें असत्य और अप्रमाणीकता का शासन चलने लगा है.

में संसार के सारे मनुष्यो को एक हीं सवाल पुछ्ता हुं के क्या आप की मृत्यु का कोइ समय नियत है..जैसे जन्म हुआ है वैसे ही कभी भी, कही भी हमारा मृत्यु भी होना है. आज असत्य और अप्रमाणीकता जीस तरह से बढती जा रही है उसे देखते हुए क्यां हमने अपने परीवार के लीये बटोरा हुआ सुख उसको भुगतने को मीलेगा ?… नहीं … आज जीस तरह से देश अनुशासन के बीना ही भ्रष्ट समाज व्यवस्था में डुबा है वो देखते हुए तो लगता नहीं है हमारे समाज का कोइ अच्छा भविष्य है…

आज हमे सबसे पहेले तो अपने ही परीवार के बारे में पुरे स्वार्थ के साथ सोचना है.. क्या हमे हमारे परीवार और बच्चो को भ्रष्ट समाज व्यवस्था ही प्रदान करनी है ?  हम चाहे अपने परीवार के लीये कीतना भी घन दोलत कमाले या बटोर ले उसका कोइ मतलब नहीं है, क्युकी जीस तरह से भारत की लोकशाही सरकारे भ्रष्टाचार से चल रही है उस के भविष्य को अगर सोचा जाये तो हमारे परीवार के लीये, हमारे बच्चो के लीये भी हम बहुत बडा कुशासन प्रदान करते है….

आज जो भी हमारे देश में चल रहा है… सरकार में बैठे राजनैतिक लोग जीस तरह से जहा भी देखो भ्रष्टाचार करते है वो देखते हुऐ तो लगता है कल कोइ नेता हमारा घर लुटना चाहे तो कानूनन लुट शकता है,,वैसे तो जीस तरह से हमारे भारत की जनता का 400 लाख करोड रूपीया जो चोरी करके दुसरे देशो में छुपाये है वो हक्क्ति में तो हमारा घर लुंट कर हीं पैदा कीया है….

हम मनुष्य है.. हमारे घर परीवार के प्रति और हमारे समाज के प्रति हमारा विशेष कर्तव्य और उतर दायित्व है, 

तो हम जीस के बलबुते पर जी रहे है वो प्रकृती के प्रति भी हमारा कर्तव्य है.

आज जहां भी देखो प्रदुषण का नाच चल रहा है सभी तरह का प्रदुषण हमारी जींदगी को नुकसान करता है, 

जल का और भोजन का प्रदुषण हमारे शरीर को बिमार करके भाग्य के पहेले हीं खत्म कर देता है. तो हवा में वातावरन में फैला प्रदुषण ह्मारे सांस मे आता है तो हमारे सांसो को भी खत्म कर देता है.

इस तरह समाज व्यवस्था में फैला कोइ भी प्रदुषण हमारी आंतरीक जींदगी को बहुत नुकसान करता है, 

बनी बनायी संपतिया और सुख यहा पडा रहेता है हमारे मृत शरीर को अपने ही परीवार के लोग जला देते है या पानी में फैक देते या तो जमींनमें गाड देते है..  अंत मे तो यही होना है.

हमे बहुत बडा दुःख इस बात है के ह्मारे देश के नागरीक हमारे वोट लेकर सरकार बनाते है और फीर भ्रष्टाचार कर के अरबो रूपीये बटोरते है.

उसमें से वो कीतना भुगतते है ?

आज 400 लाख करोड की धन राशी विदेशमें छुपानेवाले भी तो आखीर तो हमारी तरह गेंहु की रोटी या मेंदा की चीजे ही तो खा रहे… हम जो फल कुदरती अवस्था मे खाते है वो उसको निचोड कर पीते है, 

कोइ ऐसा प्रमाण है..जो अरबपति हो तो उसको और 100 साल की जींदगी बोनस के रूप में मीलती हो ?

जीसने भी भ्रष्टाचार कीया है..अरबो रूपीयो की पुजी बनायी है वो हमारे ही परीवार के सदस्य है वो खुद तो सही में रात दिन भ्रष्टाचार करने में और पैसा लुंटने में जींदगी बसर करते है.. और अचानक एक समय जींदगी की साम ढल जाती है…. क्या मतलब है वो संपति का जो भुगतने को ना मिले..सोने की थाली मे खायी गयी रोटी से आयुष्य की मात्रा कभी बढती नहीं है.. जींदगी का प्रारब्ध तो हमारे सत्य और असत्य के कर्मो पर निर्भर करता है…

कर्म ही जीवन का उकत निर्माण करता है…

हमने ही चूनावो में जातीवाद कीया है, हमने ही प्रांतवाद कीया है. हमने ही एक हीं उम्मीदवार को दुबारा वोट देने का पापकर्म कीया है तो आज हम सब भ्रष्टाचार की राजनीति के चुंगाल में बराबर के फंसे है… हम जानते है की कर्म का फल भुगतना पडता है..आज नहीं तो कल कर्मो के फल तो हमे भुगतना ही है, आज सरकारे भ्रष्ट हो गयी है वो सब राजनैतिक लोगो को बारबार वोट देकर हमने ही भ्रष्टाचार का उसको पुरा अवसर दीया है..

अब हमे हीं सतकर्म करके उनको जरा सहीं रास्ते पे लाना है,  आप सब, उनको वोट नहीं देना जो हम से एक बार पहेले वोट ले चुका है. हमे अपने स्वार्थ के लीये ये सब नहीं करना है..हमे तो वो सब भ्रष्टाचारी भाइओ और बहेनो को अपने कीये पापकर्मो के फल भुगतने से बचाना है..आखीर तो वो सब हमारे ही परीवार के या ने की हमारे ही देश के लोग है.

एक बार वोट जीसको दीया जाता है उसको दुबारा वोट देना ही पापकर्म है.. ये शास्त्रो में तो नहीं लीखा है..लेकीन आज जो शास्त्रोमें लीखा हुआ पढने को मीलता है वो सब बहुत लंबे अनुभव के साथ बराबर समज ने के बाद ही हमारे रुषि मुनीओ ने लीखा है. आज से ये भी एक नये शास्त्र का ही सत्य वचन बन जायेगा की …..

“कोइ भी लोकशाही राज्य व्यव्स्था में एक बार मतदान दीया हो उसको दुबारा मतदान देना या उसके परीवार के सदस्यो को भी मतदान करना पापकर्म होता है.”.

“ और इस सत्य वचन का उल्लघन करके कोइ भी दुबारा उसी को मतदान करता है तो मतदान पानेवाले का जीतना भी पापकर्म होता है उसका वो हिस्सेदार बन जाता है. “

हमारी मनुष्य रूप में जन्म की आयुष्य बहुत छोटी होती हैं.. मनुष्य के रूपमें जीवन प्राप्त होना बहुत कठीन होता है.. हम देख रहे है की एक मनुष्य प्रधानमंत्री बनता है तो एक मनुष्य मजदूरी कर के जीवनभर आधा भुखा रहेकर मर जाता है,  ये सब कुदरत की कभी समज में ना आये ऐसी कर्मोकी व्यवस्थायें है,  हर एक मनुष्य और आत्मा के लीये चल रहे शरीर का स्वतंत्र भाग्य और स्वतंत्र प्रारब्ध होता है, 

हमने सामुहिक रूपसे कीये पापकर्मो की सजा है की हमारे ही देश के हमारे ही भाइ-बहेन हमारा घर लुंट कर, बडी मात्रामें धन चुराकर हमारी उपर हीं राज करते है……

आप को नहीं लगता के दुनिया के सभी मनुष्यो की शरीर रचनायें एक समान है, सब का लहुं लाल रंग का है, सब को दो हाथ है, सब को दो पांव है, दो आंखे है,  दो कान है,  सबकुछ एक समान है  सब को खाने की जरूरत होती है, सब को जल पी ने की जरूरत होती है, 

फिर भी हमारे सब के बीच में समजदारी का ही सबसे बडा भेद है… हमारा कर्तव्य ही हमारा धर्म होता है, लेकीन हमने अपने मतलब के लीये बहुत  सारे धर्म नये बनाये है, उसके बाद कर्तव्य और कर्मो के हिसाब से जाती और ज्ञाती बनाते गये,  खान पान और जीवन जीने की प्रणालीका समय समय पर बदलती गयी, धीरे धीरे हमारे बीच में नये नये मनुष्यो का जन्म होता गया और मनुष्य समाज चींटीओ की तरह पैदा होने और मरने लगा, समय समय पर जीवन के मुल्य भी बदलते रहे, हम सब जातीओ और कोम के रूप में नयी नयी व्यवस्थाओ में कैद होते गये, हमने प्रांत और वातावरण की अनुकुलता को देख कर अपने ही धर्म बनायें है,  हमारी प्रार्थना मे भेद होता गया, हमे धर्म के स्थानो में अलग अलग व्यवस्थायें, और बहुत मात्रा में मनुष्य राशी को निभाने के लीये हमने ही हमारे बीच मे तरह तरह की दिवारे बनायी है.

सत्य तो ये है की आप को और हम सब को एक दिन अचानक मरना ही है, हमारा जन्म हुआ है तो हमारा मृत्यु भी निच्शित है,

तो जीस कर्मो के फल स्वरूप हमे मनुष्य के रूप में जन्म प्राप्त हुआ है उस जीवन को पाप कर्मो में ही बीताना है क्या ?

कीतना भी धन कमाओ, कीतनी भी सता भुगतो,  चाहे कीतना भी महेल चुनवा लो, सारे संसार का धन पा ने के बाद भी आप को, हमको,  एक के बाद के जैसे जन्म प्राप्त कीया है विसे ही मृत्यु को प्राप्त होना है, आज जो मनुष्य जन्म मीला है वो जन्म हंमेशा नहीं मीलता है जीवन मै कीये कर्मोसे भाग्य बनता है भाग्य के फल अनुरूप हमे योनी का योग प्राप्त होता है  आज का कमाया सारा स्थुल धन और सुख हंमेशा के लीये नहीं रहेता है जो आप बनाते है, जो आप चुराते हो, जो आप सुख पैदा करते हो,  वो एक मानसीक बिमारी है.. कोइ सुख नहीं है ,

प्रक़ृती के साथ साथ सहज अवस्थामें जीने का नाम ही जींदगी है  एक दिन की दो रोटी के लीये हम आने वाले 50 साल की रोटी का पहेले से प्रबंध करते है इस के कारन आज देश में और दुनियामें लाखो लोग भुखे मरते है एक समय पर दो रोटी से ज्यादा तो हम खाते नहीं तो 50 साल तक जींदगी है की नहीं है वो जानते नहीं है फीर भी बहुत सारा कमाते रहते है हम अपने आपको अभी तक समज नहीं पायें है  हमने कभी अपने आप को समजा नहीं है, हम हंमेशा दुसरे पीछे चलते रहे है, 

जन्म होता हे और मृत्यु भी होती है ये बताते है की यहा खुछ भी कायम नहीं रहेता है मनुष्य के साथ साथ सारे आत्मशरीर अपने अपने रूणानुबंध से मीलते और बीछडते है, पाप और पुण्य कर्म  करके नये जीवन का निर्माण करते है,

भारत की भुमी पर जो सत्याग्रह का प्रारंभ हुआ है वो प्रक़ृती का ही तकाजा है हमारे सबके सामुहीक प्रारब्ध का ये आयाम है धीरे धीरे परीवर्तन तो हमारी मानसीकतामें सक्रिय तो था हीं लेकीन अब हमारी सबकी दिशायें एक बन के एक समुह का प्रारब्ध बन रहीं है,

हमे तो आप सबसे….

जो भ्रष्टाचार करते है..उसको…तो खास.. रूप से….

इतना ही प्रश्न है की क्यां मृर्तीओ में और फोटो में हमने जो भगवान को, जो इश्वर को माना है.. जीस के सामने हम दिया प्रगट करते है, पुष्प चडाते है.. जीस के सामने मंत्र और स्तृती करते है… उसने कभी कीसी का प्रसाद पाया है..उस ने कभी आप के पुष्प की खुश्बु पने नाक से पायी है… नहीं पायी है ना.. ये तो ह्मारे मन की श्रध्धा ही है.. की हम जो कर रहे है वो कोइ भगवान को पहुचता है… लेकीन सत्य तो ये है की दीखावा कोइ भी करो कोइ कामका नहीं है..जो भी है है आप का अपना पाप और पुण्य का कर्म है…

आज का सत्याग्रह सारे मनुष्य जाती का है.. प्रक़ृती का ही एक विधान है.. हमे धर्म और संप्रदायो की मान्यताओ और श्रध्धा को.. हमारे इश्वर के प्रति विश्वास को एक हीं कार्य में एक समान प्रारब्ध की रचना के लीये..लगाना है…. आज हम सत्य का स्विकार नहीं करेंगे तो प्रकृती भी अपना कोइ नीराला रूप प्रदान करेंगी जो हमारे लीये बहुत पीडा दायी होगा…..

ये सारी बाते मेरे मन की बनी बनायीं कोइ कल्पनायें नहीं है. ये प्रकृती का एक शब्द प्रवाह है.. आप मानो या मानो मेरे भाग्य मे और प्रारब्ध में कोइ फर्क नहीं पडता. में और मेरा शरीर प्रकृती का एक तीली जैसा पल भर का माध्यम है.. मै स्वयं कोइ अस्तित्व नहीं हुं श्र्वासा के रूपमे में एक पल का जीवन हुं.. आप के लीये मेरे मन में जो शब्द का आहवान आया था वो मैने आप सबको सत्य रूप मे कोइ भी भेदभाव या स्वार्थ के बीना ही प्रदान कीये है.. आज सत्याग्रह के अवसर में यहा पर प्रगट है ऐसे सभी आत्माओ को मै दंडवत नमस्कार करता हुं और संसार के सभी आत्माओ से मेरी प्रार्थना है की मेरे श्र्वासा से प्रगट हुए कोइ भी शब्द से कीसी भी रूपमे किसी को भी दुःख पहोचा हो तो वो मेरा दोष में स्विकार करता हुं मेरे दोष के लीये में सबसे क्षमां देने की प्रार्थना करता हुं….

सत्य आनादी से विजयी है..अनंत तक विजयी ही रहेगा…..

सत्य ही इश्वर का सही माध्यम और सच्चा स्वरूप है….

हम सबको सत्य और पवित्रता से जीनेका प्रारब्ध और जीवन प्राप्त हो इसलीये मेरी प्रार्थना है….

सत्यमेव जयते…..


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